सोमवार, 1 मार्च 2010

मरीचिका

द्वार खोल देखा जो बहार,
कोई न मैंने पाया था ,
होली की दस्तक दे मुझ को
कोई न मिलने आया था ।

सपनो का अर्धधार्द शतक ,
मनमें लिए सतत उल्लास ,
कालचक्र की रचना से मैं ,
कभी जीत न पाया था ।

पथ दूर कहीं स्तम्भ देख
मन को था एक संतोष आज
प्रकाश सतत हर वर्णविद्ध
पल पल में रंग दिवाली हो

ऐसी मेरी कामना

स्वान १/०३/१०

आज सवेरा जो हुआ

आज सुबह सूरज निकला जो ,
किरण आस की लाया था वो,
सपनो की दुनिया को फुसला के ,
मुझ से मिलने आया था वो।

उठ के देखा सुबह नई थी ,
नई उठी हरियाली थी,
शीतल शीतल मंद बयार थी,
कोयल की कूंक निराली थी ।

कलिका गण संगीत सर्जन कर ,
भंवरों को राग सुंनातीं थीं,
मंद व्यार भी तान छेड़,
इक रास प्रकट कर जाती थी।

कोमल सुंदर द्रश्य देख ये ,
मन मंत्र मुग्ध मन मचल उठा ,
फिर बार माँ प्रक्रति ने ,
स्वर्णिम प्रभात प्रदान किया .

स्वान २८ /०२ /10