बूंद का दर्पण
कल की फुहारें
दिल को नम करके
एक तपिश का आगाज़
एक शीतलता का वार
मेरे पीछे का दृश्य
मधुकर पथ का पटल
देखने का साहस
न जुटा न मिला
एक समागम एक अपूर्णता
सम्पूर्णता की नियति
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बस कल की फुहारें
हंस के ....................
चातक 25 सितम्बर 2010