शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

दिल ही दिल अक्सर

दिल ही दिल अक्सर

अक्सर तुमने मुझको  यूँ ही
गुनगुनाते देखा होगा

देर रात अँखियाँ बादल
के पार  टिमटिमाते देखा  होगा

चलते  चलते  रुक के तुमने
पीछे मुद के सुखी आखों का
सैलाब पुराना देखा होगा

बस इंतज़ार में




swan 14/8/10

विडंबना

विडंबना

कौन लो के प्राणी हो तुम
कौन धरा हरियाली हो तुम
संसार विमुख करके सारा
किस पगडण्डी अनुगामी  हो तुम

छोड़  के सारे जीवन सहचर
उच्च शिखर कैसा आकर्षण

सब  देन निकट सब संग सदा
समतल प्रतिविम्वित उच्च शिखर


उच्च शिखर  ये  उच्च शिखर