सोमवार, 1 मार्च 2010

मरीचिका

द्वार खोल देखा जो बहार,
कोई न मैंने पाया था ,
होली की दस्तक दे मुझ को
कोई न मिलने आया था ।

सपनो का अर्धधार्द शतक ,
मनमें लिए सतत उल्लास ,
कालचक्र की रचना से मैं ,
कभी जीत न पाया था ।

पथ दूर कहीं स्तम्भ देख
मन को था एक संतोष आज
प्रकाश सतत हर वर्णविद्ध
पल पल में रंग दिवाली हो

ऐसी मेरी कामना

स्वान १/०३/१०

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