शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

दिल ही दिल अक्सर

दिल ही दिल अक्सर

अक्सर तुमने मुझको  यूँ ही
गुनगुनाते देखा होगा

देर रात अँखियाँ बादल
के पार  टिमटिमाते देखा  होगा

चलते  चलते  रुक के तुमने
पीछे मुद के सुखी आखों का
सैलाब पुराना देखा होगा

बस इंतज़ार में




swan 14/8/10

विडंबना

विडंबना

कौन लो के प्राणी हो तुम
कौन धरा हरियाली हो तुम
संसार विमुख करके सारा
किस पगडण्डी अनुगामी  हो तुम

छोड़  के सारे जीवन सहचर
उच्च शिखर कैसा आकर्षण

सब  देन निकट सब संग सदा
समतल प्रतिविम्वित उच्च शिखर


उच्च शिखर  ये  उच्च शिखर

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बूंद का दर्पण

बूंद का दर्पण 

कल की फुहारें

दिल को नम करके 

एक तपिश का आगाज़ 

एक शीतलता का वार 


मेरे  पीछे का दृश्य 

मधुकर पथ का पटल 


देखने का साहस 

न जुटा न मिला 

एक समागम  एक अपूर्णता 

सम्पूर्णता की नियति 

...........................

बस कल की फुहारें 


हंस के  ....................




चातक  25 सितम्बर 2010 

रास्ते



रास्ते 


बीच समंदर पंछी दरिया
उड़ उड़ के लहरों की टकरान
एक बूँद चालक अँखियाँ तर के
दे जाती चिर परिचित मुस्कान

शायद----------

जीना इसी का नाम है 

सोमवार, 1 मार्च 2010

मरीचिका

द्वार खोल देखा जो बहार,
कोई न मैंने पाया था ,
होली की दस्तक दे मुझ को
कोई न मिलने आया था ।

सपनो का अर्धधार्द शतक ,
मनमें लिए सतत उल्लास ,
कालचक्र की रचना से मैं ,
कभी जीत न पाया था ।

पथ दूर कहीं स्तम्भ देख
मन को था एक संतोष आज
प्रकाश सतत हर वर्णविद्ध
पल पल में रंग दिवाली हो

ऐसी मेरी कामना

स्वान १/०३/१०

आज सवेरा जो हुआ

आज सुबह सूरज निकला जो ,
किरण आस की लाया था वो,
सपनो की दुनिया को फुसला के ,
मुझ से मिलने आया था वो।

उठ के देखा सुबह नई थी ,
नई उठी हरियाली थी,
शीतल शीतल मंद बयार थी,
कोयल की कूंक निराली थी ।

कलिका गण संगीत सर्जन कर ,
भंवरों को राग सुंनातीं थीं,
मंद व्यार भी तान छेड़,
इक रास प्रकट कर जाती थी।

कोमल सुंदर द्रश्य देख ये ,
मन मंत्र मुग्ध मन मचल उठा ,
फिर बार माँ प्रक्रति ने ,
स्वर्णिम प्रभात प्रदान किया .

स्वान २८ /०२ /10

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

व्यथा

दुःख दर्द का रीता प्याला मैं ,
पल पल छलकन तैयार खड़ा ।

अंखियन आंसू इक बूँद धरे ,
देखन सारा संसार चले ,
चार कदम चल के जब,
झलकत है कुछ प्रतिबिम्ब सार ,
अधरं मुस्की अँखियाँ जल तर ,
मन अकुलाता मर मार पडा।

दुःख दर्द का रीता प्याला मैं ,
पल पल छलकन तैयार खड़ा ।।

प्रतिज्ञा

आज अभी तम गलियारों का ,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

अपनी सुप्त क्षीण आभा का,
संचार मुझे करना होगा ।

समय शेष न मर्गोंमुख ,
कंटक हैं अब सदा पथो तर।

लेकिन मेरी अभिलाषा का,
सम्मान मुझे करना होगा ।

सोता था अभी आराम किये ,
कुछ न था रण का ध्यान किए ।

इक तीब्र ध्वनि का झंझाबात,
हर बार मुझे करना होगा ।
..........................................
आज अभी तम गलियारों का,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

प्रकृति

आना जाना लगा रहेगा ,
रात दिवस नित शून्य तथा ,
नित नव्या पुरा के ये संगम ,
जीवन दर्शन प्रशस्त करेगा।

आना जाना लगा रहेगा ,
प्रात सुबह के ये खग व्रंदन ,
श्याम सावला लालीम आकाश ,
संगीत सदा ऊच्च नाद बहेगा ।

आना जाना लगा रहेगा ॥

मेरे मन

साँसों की लहरों में घिरकर ,
जाने क्यों मन डूब रहा है ,
अन्तः बिह्वल बिचलित होकर,
क्रंदन स्वर क्यूँ गूँज रहा है ,
रक्त स्वत नित श्वेत श्वेत ,
मुख लाल मलिन संकेत मात्र ,
भावों की भिव्यक्ति लाचार ,
मुझ पर ये तम क्यों डोल रहा है ,
साँसों की लहरों में घिरकर,
जाने क्यों मन डूब रहा है ।

अंततः

आखिर उसने पूँछ लिया ही,
इतना प्यार मुझे क्यूँ है ,

मेरे दिल की धड़कन को ,
इंतना बेहाल सुना क्यों है,

दिन की चौखट दस्तक देती ,
रातें भी करवटें बदलती ,

भीड़ों के सन्नाटे मैं भी,
धड़कन संगीत मधुर क्यों है ,

प्यार तुम्हे इतना हैं फिर भी ,
मुस्कान अधर क्यूँ है ,

आखिर उसने पूँछ लिया ही,
इतना प्यार मुझे क्यूँ है ।

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वेदना

कौन सुना वह वेदना मन की,
कौन कहा अँखियाँ भीगी हैं,
यही सोंच की दौड़ प्रहर की,
पल पल ये सदिय बीतीं हैं,
तुमरा मुखड़ा धर उर अन्दर,
जग जीवन सब लांघ चुकी हैं।

और अब तो बस .........
आ नैनन में तोहे मैं भर लूं ,

पिया बाबरा .....................

दीपांजलि


दीपांजलि

उच्च शिखर जीवन दर्शन सा,
संकल्प एक प्रत्थान करूँ तो ,
श्रद्धा सुमन तुझ को अर्पित कर ,
दीपांजलि चिर प्रति दान करूँ मैं .
युग बीत गया भाव दीप गया ,
संशय मात्र एक शेष रहा अब,
तुम से ये जीवन मूल्य ग्रहण कर ,
दर्शन का चिर प्रसार करूँ मैं ।
ऐसी मेरी कामना ..............


SWAN SEPT 17