आज सुबह सूरज निकला जो ,
किरण आस की लाया था वो,
सपनो की दुनिया को फुसला के ,
मुझ से मिलने आया था वो।
उठ के देखा सुबह नई थी ,
नई उठी हरियाली थी,
शीतल शीतल मंद बयार थी,
कोयल की कूंक निराली थी ।
कलिका गण संगीत सर्जन कर ,
भंवरों को राग सुंनातीं थीं,
मंद व्यार भी तान छेड़,
इक रास प्रकट कर जाती थी।
कोमल सुंदर द्रश्य देख ये ,
मन मंत्र मुग्ध मन मचल उठा ,
फिर बार माँ प्रक्रति ने ,
स्वर्णिम प्रभात प्रदान किया .
स्वान २८ /०२ /10
ultimate.....
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