गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बूंद का दर्पण

बूंद का दर्पण 

कल की फुहारें

दिल को नम करके 

एक तपिश का आगाज़ 

एक शीतलता का वार 


मेरे  पीछे का दृश्य 

मधुकर पथ का पटल 


देखने का साहस 

न जुटा न मिला 

एक समागम  एक अपूर्णता 

सम्पूर्णता की नियति 

...........................

बस कल की फुहारें 


हंस के  ....................




चातक  25 सितम्बर 2010 

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