बुधवार, 29 मई 2019

अनंत  की  ओर

चल पड़े  हम   चल पड़े हम  
चिर  सजग   अमरत्व  लेकर,

मुस्कुरा यूँ,  विदा देते 
बन  झरोखे,  मील पत्थर ,

मार्ग कंटक   स्वागत समर्पित
सजग हो  जीवन दे अर्पित,

सर्वथा  इक   नव सृजन 
ध्येय    विचलन सतत अर्पित  , 

एकाग्र मन  ईश्वरीय श्रद्धा  ,
सर्व:  सम :  केवल   समीकरण

वायु वेग   संवाद  संबल
ध्येय बस  नित  लक्ष्य  भेदन ,

बस लक्ष्य बस शत लक्ष्य भेदन........

सज्ज संबल  विमल दर्शन.
चल पड़े बस चल पड़े हम


शुभकामनाओ सहित  चंद्रा जी को सादर समर्पित 
                                                    विमल "चातक "
                                                    26-जून-2019 



शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

दिल ही दिल अक्सर

दिल ही दिल अक्सर

अक्सर तुमने मुझको  यूँ ही
गुनगुनाते देखा होगा

देर रात अँखियाँ बादल
के पार  टिमटिमाते देखा  होगा

चलते  चलते  रुक के तुमने
पीछे मुद के सुखी आखों का
सैलाब पुराना देखा होगा

बस इंतज़ार में




swan 14/8/10

विडंबना

विडंबना

कौन लो के प्राणी हो तुम
कौन धरा हरियाली हो तुम
संसार विमुख करके सारा
किस पगडण्डी अनुगामी  हो तुम

छोड़  के सारे जीवन सहचर
उच्च शिखर कैसा आकर्षण

सब  देन निकट सब संग सदा
समतल प्रतिविम्वित उच्च शिखर


उच्च शिखर  ये  उच्च शिखर

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बूंद का दर्पण

बूंद का दर्पण 

कल की फुहारें

दिल को नम करके 

एक तपिश का आगाज़ 

एक शीतलता का वार 


मेरे  पीछे का दृश्य 

मधुकर पथ का पटल 


देखने का साहस 

न जुटा न मिला 

एक समागम  एक अपूर्णता 

सम्पूर्णता की नियति 

...........................

बस कल की फुहारें 


हंस के  ....................




चातक  25 सितम्बर 2010 

रास्ते



रास्ते 


बीच समंदर पंछी दरिया
उड़ उड़ के लहरों की टकरान
एक बूँद चालक अँखियाँ तर के
दे जाती चिर परिचित मुस्कान

शायद----------

जीना इसी का नाम है 

सोमवार, 1 मार्च 2010

मरीचिका

द्वार खोल देखा जो बहार,
कोई न मैंने पाया था ,
होली की दस्तक दे मुझ को
कोई न मिलने आया था ।

सपनो का अर्धधार्द शतक ,
मनमें लिए सतत उल्लास ,
कालचक्र की रचना से मैं ,
कभी जीत न पाया था ।

पथ दूर कहीं स्तम्भ देख
मन को था एक संतोष आज
प्रकाश सतत हर वर्णविद्ध
पल पल में रंग दिवाली हो

ऐसी मेरी कामना

स्वान १/०३/१०

आज सवेरा जो हुआ

आज सुबह सूरज निकला जो ,
किरण आस की लाया था वो,
सपनो की दुनिया को फुसला के ,
मुझ से मिलने आया था वो।

उठ के देखा सुबह नई थी ,
नई उठी हरियाली थी,
शीतल शीतल मंद बयार थी,
कोयल की कूंक निराली थी ।

कलिका गण संगीत सर्जन कर ,
भंवरों को राग सुंनातीं थीं,
मंद व्यार भी तान छेड़,
इक रास प्रकट कर जाती थी।

कोमल सुंदर द्रश्य देख ये ,
मन मंत्र मुग्ध मन मचल उठा ,
फिर बार माँ प्रक्रति ने ,
स्वर्णिम प्रभात प्रदान किया .

स्वान २८ /०२ /10