गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बूंद का दर्पण

बूंद का दर्पण 

कल की फुहारें

दिल को नम करके 

एक तपिश का आगाज़ 

एक शीतलता का वार 


मेरे  पीछे का दृश्य 

मधुकर पथ का पटल 


देखने का साहस 

न जुटा न मिला 

एक समागम  एक अपूर्णता 

सम्पूर्णता की नियति 

...........................

बस कल की फुहारें 


हंस के  ....................




चातक  25 सितम्बर 2010 

रास्ते



रास्ते 


बीच समंदर पंछी दरिया
उड़ उड़ के लहरों की टकरान
एक बूँद चालक अँखियाँ तर के
दे जाती चिर परिचित मुस्कान

शायद----------

जीना इसी का नाम है 

सोमवार, 1 मार्च 2010

मरीचिका

द्वार खोल देखा जो बहार,
कोई न मैंने पाया था ,
होली की दस्तक दे मुझ को
कोई न मिलने आया था ।

सपनो का अर्धधार्द शतक ,
मनमें लिए सतत उल्लास ,
कालचक्र की रचना से मैं ,
कभी जीत न पाया था ।

पथ दूर कहीं स्तम्भ देख
मन को था एक संतोष आज
प्रकाश सतत हर वर्णविद्ध
पल पल में रंग दिवाली हो

ऐसी मेरी कामना

स्वान १/०३/१०

आज सवेरा जो हुआ

आज सुबह सूरज निकला जो ,
किरण आस की लाया था वो,
सपनो की दुनिया को फुसला के ,
मुझ से मिलने आया था वो।

उठ के देखा सुबह नई थी ,
नई उठी हरियाली थी,
शीतल शीतल मंद बयार थी,
कोयल की कूंक निराली थी ।

कलिका गण संगीत सर्जन कर ,
भंवरों को राग सुंनातीं थीं,
मंद व्यार भी तान छेड़,
इक रास प्रकट कर जाती थी।

कोमल सुंदर द्रश्य देख ये ,
मन मंत्र मुग्ध मन मचल उठा ,
फिर बार माँ प्रक्रति ने ,
स्वर्णिम प्रभात प्रदान किया .

स्वान २८ /०२ /10

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

व्यथा

दुःख दर्द का रीता प्याला मैं ,
पल पल छलकन तैयार खड़ा ।

अंखियन आंसू इक बूँद धरे ,
देखन सारा संसार चले ,
चार कदम चल के जब,
झलकत है कुछ प्रतिबिम्ब सार ,
अधरं मुस्की अँखियाँ जल तर ,
मन अकुलाता मर मार पडा।

दुःख दर्द का रीता प्याला मैं ,
पल पल छलकन तैयार खड़ा ।।

प्रतिज्ञा

आज अभी तम गलियारों का ,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

अपनी सुप्त क्षीण आभा का,
संचार मुझे करना होगा ।

समय शेष न मर्गोंमुख ,
कंटक हैं अब सदा पथो तर।

लेकिन मेरी अभिलाषा का,
सम्मान मुझे करना होगा ।

सोता था अभी आराम किये ,
कुछ न था रण का ध्यान किए ।

इक तीब्र ध्वनि का झंझाबात,
हर बार मुझे करना होगा ।
..........................................
आज अभी तम गलियारों का,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

प्रकृति

आना जाना लगा रहेगा ,
रात दिवस नित शून्य तथा ,
नित नव्या पुरा के ये संगम ,
जीवन दर्शन प्रशस्त करेगा।

आना जाना लगा रहेगा ,
प्रात सुबह के ये खग व्रंदन ,
श्याम सावला लालीम आकाश ,
संगीत सदा ऊच्च नाद बहेगा ।

आना जाना लगा रहेगा ॥