बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

प्रतिज्ञा

आज अभी तम गलियारों का ,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

अपनी सुप्त क्षीण आभा का,
संचार मुझे करना होगा ।

समय शेष न मर्गोंमुख ,
कंटक हैं अब सदा पथो तर।

लेकिन मेरी अभिलाषा का,
सम्मान मुझे करना होगा ।

सोता था अभी आराम किये ,
कुछ न था रण का ध्यान किए ।

इक तीब्र ध्वनि का झंझाबात,
हर बार मुझे करना होगा ।
..........................................
आज अभी तम गलियारों का,
प्रतिकार मुझे करना होगा ।

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