VIMAL MUKTAK
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
वेदना
कौन सुना वह वेदना मन की,
कौन कहा अँखियाँ भीगी हैं,
यही सोंच की दौड़ प्रहर की,
पल पल ये सदिय बीतीं हैं,
तुमरा मुखड़ा धर उर अन्दर,
जग जीवन सब लांघ चुकी हैं।
और अब तो बस .........
आ नैनन में तोहे मैं भर लूं ,
पिया बाबरा .....................
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